सोमवार, जुलै 24, 2017
   
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राजसंन्यास अंक तिसरा (प्रवेश पहिला)

अंक तिसरा

प्रवेश पहिला

(तुळशीच्या पहिल्या रुकाराचे स्वत:शी स्मरण करीत असताना.)

संभाजी:
(चाल- जरि नाही कमल ते करी.)

तो एकच प्यारा बोल। मनी या खोल। जाऊनी बसला।
हृदयावर कायम ठसला॥                1

लाखाचे ज्याचे मोल। असा तो बोल। बोलत्या काळा।
शोभलीस राजसबाळा॥                2

तो डावा डोळा- अहा। पुन्हा हा पहा। झाकला अरधा।
करी जिवास मोहनबाधा॥              3

भिवईची तिरपी तऱ्हा। मुरडूनी जरा। त्यावरी ढळली।
टोकाशी काही चळली॥                  4

हसताना थोडे कुठे। गाल तो उठे। आणि त्या मारे।
निपजली मला परमारे॥                5

त्या रेघा चिमण्या भल्या। तोच उमटल्या। तीन की दोन
डोळयाचा साधुनी कोन॥                6

तो भरून आला ऊर। रंगरसपूर। चालला श्वासे।
ओठांवर अडले हासे॥                    7

भयभीत नवा आनंद;। पदर बेबंद। कंप कटिबंधा।
जीव झाला अरधा अरधा॥                8

नवतीची राजस लाज। गुलाबी साज। और तो काही।
गालांवर चढवी दोही॥                9

थरथरत्या ओठांवरी। प्रीत बावरी। बोल तो टाकी।
नजरेचा पडदा झाकी॥                10

तो एकच प्यारा बोल। जिवाचे मोल। घेउनी फिरूनी॥
एकदा ऐकवा कानी॥                11